किसी फिल्म की सफलता और असफलता अक्सर उसके आखिरी 10 मिनट, यानी ‘क्लाइमैक्स’ पर निर्भर करती है. बॉलीवुड के इतिहास में कई ब्लॉकबस्टर फिल्में हैं जिनकी शूटिंग के दौरान उनकी एंडिंग असल में अलग थी, लेकिन आखिरी मिनट में लिए गए एक बड़े फैसले ने सब कुछ बदल दिया. चाहे वह ‘शोले’ में गब्बर की मौत को गिरफ्तारी में बदलना हो या ‘बाजीगर’ में हीरो का बलिदान, इन बदलावों ने न सिर्फ फिल्म की किस्मत बदली, बल्कि उन्हें टाइमलेस क्लासिक्स भी बना दिया. आइए जानते हैं 5 ऐसी फिल्मों के बारे में जिनके बदले हुए क्लाइमैक्स ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया.
नई दिल्ली. बॉलीवुड का इतिहास ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जहां फिल्में एक एंडिंग के साथ शूट की गईं, लेकिन आखिरी मिनट में डायरेक्टर या प्रोड्यूसर की ‘गट फीलिंग’ ने पूरा क्लाइमैक्स बदल दिया. कभी-कभी ये बदलाव सिर्फ एक सीन के बारे में नहीं थे, बल्कि पूरी फिल्म के सार के बारे में थे.
नई दिल्ली. बॉलीवुड का इतिहास ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जहां फिल्में एक एंडिंग के साथ शूट की गईं, लेकिन आखिरी मिनट में डायरेक्टर या प्रोड्यूसर की ‘गट फीलिंग’ ने पूरा क्लाइमैक्स बदल दिया. कभी-कभी ये बदलाव सिर्फ एक सीन के बारे में नहीं थे, बल्कि पूरी फिल्म के सार के बारे में थे.
दिलचस्प बात यह है कि अगर ये बदलाव नहीं किए गए होते, तो शायद ये फिल्में आज ‘ब्लॉकबस्टर’ की लिस्ट में शामिल नहीं होतीं. आज हम आपको 5 ऐसी फिल्मों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके क्लाइमैक्स आखिरी मिनट में बदले गए और उन्होंने इतिहास रच दिया.
1. शोले (1975): बॉलीवुड की सबसे महान फिल्मों में से एक ‘शोले’ की एंडिंग असल में आज हम जो देखते हैं, उससे कहीं ज्यादा हिंसक और डरावनी थी. डायरेक्टर रमेश सिप्पी ने शुरू में जो एंडिंग शूट की थी, उसमें ठाकुर (संजीव कुमार) गब्बर सिंह (अमजद खान) को अपने पैरों (जिनमें नुकीले जूते थे) से मारकर बदला लेते हुए दिखाया गया था. यह एक बहुत ही इमोशनल और क्रूर सीन था. जब फिल्म सेंसर बोर्ड के पास गई, तो उन्होंने इस पर आपत्ति जताई. उनका तर्क था कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी (ठाकुर) को कानून अपने हाथ में लेते हुए दिखाना गलत संदेश देगा. बोर्ड को यह भी लगा कि हिंसा बहुत ज्यादा है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो रमेश सिप्पी ने क्लाइमैक्स बदल दिया और फाइनल वर्जन में, पुलिस आती है और ठाकुर को गब्बर को मारने से रोकती है.
2. हम आपके हैं कौन (1994): सूरज बड़जात्या की यह फिल्म भारतीय पारिवारिक फिल्मों की ‘बाइबल’ मानी जाती है, लेकिन इसका असली एंडिंग काफी दुखद होने वाला था. कहा जाता है कि कहानी के शुरुआती ड्राफ्ट के अनुसार, निशा (माधुरी दीक्षित) और प्रेम (सलमान खान) का मिलन नहीं होना था. निशा की शादी राजेश (मोहनीश बहल) से होनी थी, और फिल्म ‘बलिदान’ की कहानी के तौर पर खत्म होती. कुछ रिपोर्ट्स तो यह भी बताती हैं कि आखिर में एक बड़े किरदार की मौत का आइडिया भी सोचा गया था. फिल्म के ट्रायल रन के दौरान, यह महसूस किया गया कि दर्शक पूरी फिल्म में संगीत और उत्सव का आनंद ले रहे थे. ऐसे में, एक दुखद एंडिंग दर्शकों को निराश कर सकती थी. फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स और क्रू ने सुझाव दिया कि जनता ‘हैप्पी एंडिंग’ देखना चाहती है. आखिरी समय में, मशहूर ‘कुत्ते’ (टफी) वाला सीन जोड़ा गया, जिसमें कुत्ता निशा का खत बाबूजी तक पहुंचाता है. इस हैप्पी एंडिंग ने फिल्म को परिवार की पसंदीदा बना दिया, जिसे बार-बार देखा जा सकता है, और इसने बॉक्स ऑफिस के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए.
3. देव डी (2009): अनुराग कश्यप की ‘देव डी’ ने ‘देवदास’ की पुरानी दुखद एंडिंग को बदल दिया और यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन गई. जैसा कि शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास और पिछली फिल्मों (दिलीप कुमार और शाहरुख खान वाली) में था, देव को पारो के घर के बाहर दर्दनाक मौत मरना था. एक्टर अभय देओल भी फिल्म को ओरिजिनल कहानी के हिसाब से रखने के पक्ष में थे, लेकिन अनुराग कश्यप का मानना था कि आज के युवा ‘आत्म-विनाश’ में विश्वास नहीं करते. वह दिखाना चाहते थे कि गलतियां करने के बाद भी जिंदगी में दूसरा मौका मिलता है. देव की जान बच जाती है, और वह चंदा (कल्कि कोचलिन) के साथ एक नई जिंदगी शुरू करता है. यह मॉडर्न एंडिंग युवाओं को पसंद आई और फिल्म एक ‘कल्ट क्लासिक’ बन गई.
4. बाजीगर (1993): ‘बाजीगर’ का क्लाइमैक्स, जिस फिल्म ने शाहरुख खान के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, वह फिल्म का दिल है, लेकिन शुरू में यह अलग था. ओरिजनल स्क्रीनप्ले में अजय शर्मा (शाहरुख) को अपना बदला लेने के बाद पुलिस के हवाले किया जाना था, या वह जेल जाता. उसे एक अपराधी की तरह खत्म होना था. फिल्म बनाने वालों को लगा कि भले ही उसने खून किए थे, लेकिन दर्शक उसके साथ सहानुभूति रख रहे थे. उसे पुलिस द्वारा पकड़े जाते हुए देखकर दर्शक शायद असंतुष्ट महसूस करते. क्लाइमैक्स को ‘इमोशनल बलिदान’ में बदल दिया गया. अजय अपनी मां की गोद में आखिरी सांस लेता है. इस सीन ने थिएटर में मौजूद सभी की आंखों में आंसू ला दिए और शाहरुख खान रातों-रात सुपरस्टार बन गए.
5. कयामत से कयामत तक (1988): निर्देशक मंसूर खान ने शुरुआत में राज (आमिर खान) और रश्मि (जूही चावला) के मिलन की योजना बनाई थी. उन्हें घर से भागकर अपनी खुशहाल दुनिया बसाते हुए दिखाया जाना था. मंसूर खान को लगा कि एक साधारण प्रेम कहानी के लिए ‘हैप्पी एंडिंग’ बहुत सामान्य होगी. उन्होंने इसे ‘रोमियो-जूलियट’ जैसी एक अमर प्रेम कहानी बनाने के लिए दोनों मुख्य पात्रों को मारने का साहसी फैसला लिया. फिल्म का वह सीन जहां दोनों सूर्यास्त के समय एक-दूसरे का हाथ थामे मर जाते हैं, भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित दृश्यों में से एक बन गया. इसी अंत की वजह से फिल्म दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गई.
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Pratik ShekharPratik Shekhar is leading the entertainment section in News18 Hindi. He has been working in digital media for the last 12 years. After studying from Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Co…और पढ़ें