पॉप स्टार शकीरा अप्रैल में अपनी भारत यात्रा को लेकर फिलहाल चर्चा में हैं। ‘वक्का-वक्का’ की धुनों पर पूरी दुनिया को नचाने वाली शकीरा का करियर बेहद उतार–चढ़ावों से भरा रहा है। जानते हैं, उनकी संघर्ष से सफलता की कहानी… गाना लिखना, उसे गाना और हर बीट पर सटीक डांस मूव देना, कोलंबिया की विश्वविख्यात पॉप स्टार शकीरा इन सभी हुनरों का शानदार कॉम्बिनेशन हैं। लेकिन स्कूल में उनकी आवाज टीचर को नहीं भायी थी। स्कूल में मजाक उड़ाया जाता कि उनकी आवाज बकरी जैसी है। बारांक्विला शहर में 2 फरवरी 1977 को जन्मी शकीरा आज स्पेनिश और अंग्रेजी के साथ आधा दर्जन भाषाओं की गायकी में पारंगत हैं। संघर्ष – आर्थिक तंगी झेली, करियर से ब्रेक लेना पड़ा शकीरा जब 7–8 साल की थीं, तो उनके पिता विलियम मेबारक को ज्वैलरी व्यवसाय में भारी घाटा हुआ। शकीरा ने घर का सामान, फर्नीचर, कार सब बिकते हुए देखे। उन्हें इससे मानसिक आघात पहुंचा। 13 वर्ष की उम्र में उन्हें पहला कॉन्ट्रैक्ट मिला। 1991 में पहला एलबम ‘मैगिया’ और 1993 में दूसरा ‘पेलिग्रो’ आया, लेकिन दोनों ही बुरी तरह फ्लॉप रहे। विफलता के चलते उन्हें करियर से एक साल ब्रेक लेना पड़ा। 2017 में एल–डोराडो वर्ल्ड ट्यूर से ठीक पहले उनकी वोकल कॉर्ड में हैमरेज हो गया। उन्हें लगा कि अब वे कभी नहीं गा पाएंगी। हालांकि कुछ महीनों के ब्रेक और उपचार से बिना सर्जरी के यह ठीक हाे गया। सफलता – वक्का–वक्का पर दुनिया नचाई, 3 ग्रैमी जीते शुुरुआती विफलताओं के बाद शकीरा ने खुद को नए सिरे से तैयार किया। खुद अपने गाने लिखने लगीं और फिर 1995 में आया एलबम ‘पिएस देस्काल्जोस’ टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। 2001 में उनका पहला इंग्लिश एलबम ‘लॉन्ड्री सर्विस’ रिलीज हुआ। इसकी दुनियाभर में 1.3 करोड़ कॉपियां बिकीं और शकीरा वैश्विक स्टार बन गईं। 2010 में उनका ‘वक्का–वक्का’ गीत फुटबॉल वर्ल्ड कप का एंथम बना, जिसने पूरी दुनिया को शकीरा के सुरों का दीवाना बना दिया। शकीरा को 3 ग्रैमी और 12 लैटिन ग्रैमी समेत संगीत को ढेरों अवॉर्ड मिल चुके हैं। वे संयुक्त राष्ट्र की गुडविल एम्बेसडर रह चुकी हैं। 1997 में शकीरा ने गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए पिएस देस्काल्जोस फाउंडेशन शुरू किया था। उनकी नेटवर्थ करीब 300 मिलियन डॉलर बताई जाती है।
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