रंगो के त्यौहार होली में मनोज तिवारी ‘मृदुल’ के इस गाने के बिना रंगों की मस्ती अधूरी मानी जाती है. यह केवल एक गाना नहीं, बल्कि उत्तर भारत में होली के हुड़दंग और हास्य-व्यंग्य की पहचान है इस गाने की लोकप्रियता इसकी ‘व्यंग्यात्मक शैली’ और ठेठ देशी लय में छिपी है: हर होली में कोई ना कोई सम्मेलन होता आया है तो गाने के बोल इसी तरह से है “होता सम्मेलन होली में’ यह गाना हर पीढ़ी को भाता है इस गाने में हास्य और ठिठोली की भरमार है गाने में देवर-भाभी और गांव की होली के उस अनोखे अंदाज को पिरोया गया है, जो हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है 90 के दशक और 2000 की शुरुआत में कैसेट के दौर में यह गाना हर घर में गूंजता था और आज भी युवा पीढ़ी इस गाने पर जमकर थिरकते है .
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