6 Best Gujarati Movies: गुजराती सिनेमा में अक्सर डांडिया और पारंपरिक संगीत की इमेज बनती है, लेकिन पिछले एक दशक में ‘ढोलिवुड (Dhollywood)’ ने इस इमेज को पूरी तरह तोड़ दिया है. गुजराती फिल्में अब सिर्फ रीजनल एंटरटेनमेंट नहीं हैं, बल्कि ग्लोबल कहानियों का हब बन गई हैं. ‘केवी रीते जैश’ से शुरू हुआ यह मॉडर्न बदलाव ‘रॉन्ग साइड राजू’ जैसे रोंगटे खड़े कर देने वाले सस्पेंस ड्रामा और ‘हेलारो’ जैसी नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली मास्टरपीस फिल्मों तक पहुंचा है. आज हम उन 6 चुनिंदा फिल्मों के बारे में बात कर रहे हैं जिन्होंने न सिर्फ सिनेमा की कहानी बदली बल्कि यह भी साबित किया कि कंटेंट के मामले में गुजराती फिल्ममेकर्स किसी से कम नहीं हैं.
नई दिल्ली. एक समय था जब गुजराती सिनेमा सिर्फ गांव की कहानियों और पारंपरिक लोक संगीत तक ही सीमित था, लेकिन पिछले एक दशक में ‘धोलीवुड’ ने खुद को बदल लिया है. ‘केवी रीते जैश’ से शुरू हुआ शहरी सिनेमा का यह सफर अब नेशनल अवॉर्ड्स तक पहुंच गया है. आज हम 6 लैंडमार्क गुजराती फिल्मों के बारे में बात कर रहे हैं जिन्होंने न सिर्फ सिनेमा का चेहरा बदला बल्कि दर्शकों को वापस थिएटर तक भी लाया. इन फिल्मों में एक सस्पेंस थ्रिलर भी है जिसकी कहानी बॉलीवुड की ‘दृश्यम’ को भी फीका लगा देती है. आइए गुजराती सिनेमा की इन गेम-चेंजिंग मास्टरपीस के बारे में जानें.

1. केवी रीते जैश (2012): अगर मॉडर्न गुजराती सिनेमा के नए जन्म की बात करें, तो इसकी शुरुआत ‘केवी रीते जैश’ से होती है. अभिषेक जैन के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म ने पुरानी सोच को तोड़ा. यह गुजरात के पटेल समुदाय के अमेरिका जाने के जुनून को कॉमेडी और सटायर के तौर पर दिखाती है. इस फिल्म ने पहली बार गुजराती युवाओं को उनकी अपनी भाषा में सिनेमा से जोड़ा. इसने दिखाया कि गुजराती फिल्में स्टाइलिश, मॉडर्न और रिलेटेबल हो सकती हैं.

2. बे यार (2014): अभिषेक जैन ने अपनी दूसरी फिल्म ‘बे यार’ से साबित कर दिया कि गुजराती सिनेमा में भी इमोशनल गहराई हो सकती है. प्रतीक गांधी और दिव्यांग ठक्कर स्टारिंग यह फिल्म दो दोस्तों की कहानी बताती है, जो पैसे के पीछे गलत रास्ता चुनते हैं और फिर अपनी गलतियां सुधारते हैं. इस फिल्म ने दिखाया कि गुजराती सिनेमा सिर्फ कॉमेडी ही नहीं, बल्कि सॉलिड ड्रामा भी दे सकता है. यह फिल्म प्रतीक गांधी जैसे एक्टर्स के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई.
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3. छेलो दिवस (2015): कृष्णदेव याग्निक की ‘छेलो दिवस’ ने किसी दूसरी रीजनल फिल्म जैसा सेंसेशन बनाया. आठ कॉलेज दोस्तों की इस कहानी ने हर जेनरेशन को अट्रैक्ट किया. इस फिल्म के डायलॉग आज भी सोशल मीडिया पर मीम्स के रूप में सर्कुलेट होते हैं. इस फिल्म को गुजराती सिनेमा का ‘दिल चाहता है’ या ‘छिछोरे’ माना जाता है. इसकी जबरदस्त सक्सेस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसका ‘डेज ऑफ तफरी’ नाम का एक बॉलीवुड रीमेक भी बना.

4. रॉन्ग साइड राजू (2016): अब बात करते हैं उस फिल्म की जिसने सस्पेंस और थ्रिलर में नए स्टैंडर्ड सेट किए. ‘रॉन्ग साइड राजू’ एक ऐसी फिल्म है जिसे देखते समय आप अपनी पलकें नहीं झपका पाएंगे. मिखिल मुसाले के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म एक हिट-एंड-रन केस के इर्द-गिर्द घूमती है. जहां ‘दृश्यम’ में एक पिता अपने परिवार को बचाने के लिए झूठ का सहारा लेता है, वहीं ‘रॉन्ग साइड राजू’ में सस्पेंस की परतें इतनी उलझी हुई हैं कि क्लाइमैक्स देखकर दर्शक हैरान रह जाते हैं. फिल्म का स्क्रीनप्ले और सिनेमैटोग्राफी इंटरनेशनल लेवल की है. इसलिए, इसे बेस्ट गुजराती फिल्म का नेशनल अवॉर्ड भी मिला.

5. लव नी भवई (2017): ‘लव नी भवई’ रोमांटिक कॉमेडी पसंद करने वालों के लिए एक माइलस्टोन है. मल्हार ठाकर, प्रतीक गांधी और मानसी पारेख की इस ट्रायंगुलर लव स्टोरी ने दिखाया कि गुजराती फिल्में कितनी कलरफुल और म्यूजिकल हो सकती हैं. फिल्म का म्यूजिक, ‘धुन लगी,’ उस साल का सबसे बड़ा चार्टबस्टर बना. इस फिल्म ने मल्हार ठाकर को गुजराती सिनेमा का ‘चॉकलेट बॉय’ और सुपरस्टार बना दिया.

6. हेलारो (2019): ‘हेलारो’ गुजराती सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी. कच्छ की लोक कथाओं और महिलाओं के आत्म-सम्मान पर आधारित इस फिल्म ने 66वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड जीतकर पूरे देश को चौंका दिया था. यह पहली बार था जब किसी गुजराती फिल्म को भारत की बेस्ट फिल्म चुना गया था. इसके गरबा सीन और दमदार कहानी ने दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल्स में तारीफें बटोरीं.
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